April 1, 2020

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बेस्ट मोटिवेशनल हिन्दी मूवीज़ :- अगर दिन रहा खराब तो ज़रूर देखें ये 5 फ़िल्में

बेस्ट मोटिवेशनल हिन्दी मूवीस

किसी ने बिल्कुल सही कहा है “महानता कभी न गिरने में नहीं बल्कि हर बार गिरकर उठ जाने में है” तो गिरने से कभी घबराइए नहीं, कभी थकिये नहीं क्योंकि आप तब तक नहीं हारते जब तक आप खुद से ना हार जाए| कभी कभी हमे लगता है की बस अब नहीं होगा मुझसे, मैं थक गया हूँ तो आज का हमारा यह आर्टिकल आपके लिए है आज हम आपको बेस्ट मोटिवेशनल हिन्दी मूवीज़ के अंतर्गत बॉलीवुड की कुछ ऐसी फ़िल्मों के बारे में बताएंगे जिनको देखकर आप फिर से उठेंगे और अपनी रेस में वापस आ जाएंगे|

जैसा की हम सब जानते है भारत में फ़िल्मों को अत्यधिक मान्यता दी जाती है| भारत की फ़िल्मों को पूरी दुनिया में सराहा जाता है और आज हम आपको ऐसी फ़िल्मों के बारे में बताएंगे जिससे आप अपना मूल्य समझेंगे और इन फ़िल्मों को देखे कर आप पुनः अपनी एक नई रेस के लिए तैयार हो जायेंगे|

5 बेस्ट मोटिवेशनल हिन्दी मूवीज़

मांझी: द माउंटेन मैन

दशरथ मांझी (नवाजुद्दीन सिद्दीकी) एक गरीब व्यक्ति है, जो एक चट्टानी पर्वत शृंखला द्वारा दुनिया से कटे हुए एक दूरदराज के गांव में रहता है| वह अपनी पत्नी, फागुनीया (राधिका आप्टे) से दुनिया में सबसे ज़्यादा प्यार करता है| दुर्भाग्य से एक दिन भोजन पहुंचाने के लिए पहाड़ पर चढ़ने के दौरान उसकी पत्नी फिसल जाती है और पहाड़ से गिर कर मर जाती है| दु:ख से अभिभूत, दशरथ पहाड़ के माध्यम से एक रास्ता बनाने का फैसला करता है ताकि किसी और को उसके भाग्य का सामना न करना पड़े|

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वह एक मिशन पर निकल पड़ता है और वह मिशन 22 साल तक चलता है, सिर्फ़ एक छेनी और हथौड़ी के साथ वह अकेले उस पहाड़ को काटता है और तब तक काटता है जब तक उस पहाड़ के बीच से एक रास्ता ना बन जाए| नवाजुद्दीन सिद्दीकी की बेहतरीन एक्टिंग काबिल-ए-तारीफ़ है| इतना वास्तविक उनका प्रदर्शन था कि आप न केवल उसके दर्द के प्रति सहानुभूति रखेंगे, बल्कि सबक से भी प्रेरित होंगे| अंत में यह फ़िल्म यह बताती है कि ढृढ़ विश्वास वास्तव में पहाड़ तक को हिला सकता है|

3 ईडियट्स ‌

3 इडियट्स हमे बताती है कि जीवन में जो भी आपकी समस्या है उसके लिए बस इतना ही कहिए, “आल इज़ वेल” यह आपकी समस्याओं को हल नहीं कर सकता है लेकिन यह इसका सामना करने का साहस देता है और वही जो बच्चे सिर्फ़ मार्क्स के पीछे भागते है उन्हें यह सिखाता है “कि एक्सीलेंस के पीछे भाग सक्सेस अपने आप पीछे नहीं आती|”

यह फ़िल्म चेतन भगत की नोबेल फाइव प्वाइंट समवन पर आधारित है| फ़िल्म में, फरहान कुरैशी (आर माधवन) और राजू रस्तोगी (शरमन जोशी) इंजीनियरिंग के छात्र होते है जों अपनी व्यक्तिगत समस्याओं से निपटने के साथ शीर्ष तक पहुंचने की दौड़ में मजबूर किये जाते है| लेकिन रैंचो उर्फ छांछड़ (आमिर खान) जीवन को देखने का नजरिया बदल देता है| वह फरहान को अपने पिता का सामना करने के लिए साहस जुटाने में मदद करता है और एक इंजीनियर के बजाय एक वन्यजीव फोटोग्राफर के रूप में अपना कैरियर बनाने की इच्छा को पूरा करने के लिए समझाता है|

वह राजू रस्तोगी को अपने डर को दूर करने और उसे सच का सामना करने के लिए आत्मविश्वास हासिल करने में मदद करता है| 3 ईडियट्स भारत के शिक्षा प्रणाली को प्रकाश में लाया, जो छात्रों पर अनावश्यक दबाव डालता है| 3 ईडियट्स ने हमें सिखाया कि आपके रिपोर्ट कार्ड के अंकों की महत्ता आपके जीवन से ज्यादा महत्वपूर्ण नहीं है|

लक्ष्य (2004)

वैसे तो ऋतिक रौशन की कई फिल्में बेस्ट मोटिवेशनल हिन्दी मूवीज़ में शुमार होती हैं मगर ये फिल्म अपने समय की सबसे अलग फीचर फिल्मों में से एक है| करण (ऋतिक रोशन) एक आलसी युवा है जो अपने पारिवारिक व्यवसाय से दूर रहता है| करण के जीवन में दोस्तों के साथ घूमना और रोमी (प्रीति जिंटा) उसकी गरलफ्रेंड के साथ समय बिताना शामिल होता है| एक एक्शन फ़िल्म देखते वक्त सेना में भर्ती होने का फैसला करता है| सेना में भर्ती होने के लिए फॉर्म भरता है, फॉर्म भरने के बाद एग्जाम देता है और उसका सलेक्शन हो जाता है| जहाँ उसको सेना की सारी ट्रेनिंग दी जाती है जो की उसके लिए काफी ज़्यादा कठिन साबित होती है जिसके बाद वह सेना छोड़ने का फैसला करता है|

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इससे रोमी और उसका परिवार उसके प्रति सम्मान खो देता है| करण अपनी पहचान और आत्म-मूल्य को मान्य करने के लिए सेना में फिर से शामिल होता है और अपना आत्म सम्मान हासिल करता है| फ़िल्म आपको लक्ष्य रखने और उनके प्रति काम करने के लिए प्रेरित करती है| यह आपको याद दिलाता है कि जीवन को सुंदर बनाने के लिए उसको मायने देना ज़रूरी होता है|

इंग्लिश विंग्लिश (2012)

जब बेस्ट मोटिवेशनल हिन्दी मूवीज़ की बात करें तो इस फिल्म को भूला नहीं जा सकता| एक नामी ब्रैंड (इंग्लिश ज्ञाता) जिसके साथ लग जाता है भारत में, उसे फिर डिग्रियों की आवश्यकता नहीं होती| एक निम्न मानसिकता कि इंग्लिश बोलने वाले लोग सभ्य होते है उनमे दुनिया जहाँ कि खूबियां होती है और हिंदी भाषी लोग असभ्य होते है उनके पास डिग्रियां होते हुए भी वह ज्यादा महत्व नहीं रखते या उनके अन्य टैलेंट को अधिक महत्व नहीं दिया जाता| यह एक कड़वा सच है जिससे भारतीय समाज बुरी तरह ग्रसित है|

इंग्लिश विंग्लिश एक ऐसी ही महिला शशि (श्रीदेवी) की कहानी है, जो अपने परिवार और समाज द्वारा अयोग्य और असुरक्षित महसूस करती है क्योंकि वह अंग्रेज़ी नहीं बोल सकती| जब वह अंग्रेज़ी बोलने वाले वर्ग में दाखिला लेने का फैसला करती है तो उसकी दुनिया बदल जाती है| फ़िल्म में बेहतरीन अभिनय के लिए श्रीदेवी की सराहना की गई है| यह फ़िल्म यह बताती है कि पढ़ने और सीखने की कोई उम्र नहीं होती|

माय नेम इज खान

जब भी करन जौहर और शाहरुख खान एक साथ आए है तब-तब पर्दे पर कुछ अनोखा पेश हुआ है| उन्हीं अनोखे प्रस्तुतियों से एक हैं माय नेम इज खान| माई नेम इज खान रिजवान खान (शाहरुख खान) की कहानी है, जो अमेरिका में रहता है और एस्परगर सिंड्रोम से पीड़ित होता है| रिज़वान को अंततः प्रेम होता है और एक एकल माँ, मंदिरा (काजोल) से शादी करता है| शादी के तुरंत बाद अमरीका में 9/11 का आतंकी हमला होता है और जल्द ही मुसलमानों के खिलाफ नफरत एक बदसूरत सच्चाई में रूप में फ़ैल जाती है|

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मंदिरा के बेटे को इसलिए मार दिया जाता है क्योंकि उसका एक मुस्लिम उपनाम होता है| टूटी हुई मंदिरा रिजवान को अपनी ज़िन्दगी से बाहर निकलने के लिए कहती है| यह साबित करने के लिए कि वह आतंकवादी नहीं है, वह एक यात्रा शुरू करता है| रिज़वान अमेरिका के तत्कालीन राष्ट्रपति बराक ओबामा को अपनी कहानी सुनाने के लिए यह यात्रा शुरू करता है|

वह नफरत करने वालों पर कैसे विजय प्राप्त करता है और उसकी पत्नी उसकी कहानी का जड़ बनती है| इस फ़िल्म ने हमेशा एकता की बात की है और बताया कि किसी को भी नाम या धर्म के आधार पर गुनहगार नहीं बोला जा सकता और कोई भी कमी-कमी नहीं होती जब तक आप उसे कमी ना बोलें|

तो ये थी कुछ बेस्ट मोटिवेशनल हिन्दी मूवीज़ जिन्हे देखने के बाद आप ऐसा महसूस कर सकते है कि हमारी ज़िंदगी काफी बेहतर है, इसे और बेहतर बनाने के लिए आप प्रयास कर सकते है| अब इसे अच्छा बनाना भी आपके हाथ में है और ख़राब करना भी| अब आपको निर्णय लेना है कि आपको क्या करना है?

Image Source : dailytimes.com

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