August 4, 2020

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ठान लिया था उसी दिन गांव में आउंगा, जिस दिन आईएएस बनूंगा-नज़र सिर्फ लक्ष्य पर

ठान लिया था उसी दिन गांव में आउंगा, जिस दिन आईएएस बनूंगा-नज़र सिर्फ लक्ष्य पर

ऐसे ही काम एक चूड़ी बेचने वाले इंसान ने किया

ऐसा शख्श जिन्होंने कभी हर नहीं मानी,हर झंझावतों को झेलते हुए आगे बढ़ते चलते गए| ठान भी लिया था कि जिस दिन आईएएस बनूगां,उसी दिन गांव में आऊंगा|सच्चाई भी यही है कि देश और दुनिया में बड़े काम छोटे-छोटे लोग ही करते है| ऐसे ही काम एक चूड़ी बेचने वाले इंसान ने किया है| जिसकी मेहनत को देखकर लोग उसके जज्बे को सलाम कर रहे है|

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कहानी सुनकर आपके आँखों में आँसू आ जायँगे

हम बात कर रहे है झारखण्ड कैडर के आईएएस रमेश घोलप की| घोलप एक ऐसे शख्श है,जिन्होंने ना सिर्फ अपने सपने को साकार किया बल्कि यह साबित किया कि मेहनत और लगन से हर वो चीज़ हासिल कि जा सकती है, जो उनकी जरूरत है|

रमेश घोलप एक ऐसे व्यक्ति है, जिनकी कहानी सुनकर आपके आँखों में आँसू आ जायँगे| रमेश की माँ सड़कों पर चुड़िया बेचती थी और वह भी उनका हाथ बंटाते थे| गली-गली माँ के साथ आवाज़ भी लगते थे| रमेश के पिता की एक छोटी सी साइकिल की दुकान थी|

रमेश घोलप ने 12 वीं में 88.5% मार्क्स से परीक्षा उत्तीर्ण की

उनके पिता शराब पीते थे जिसकी वजह से उनके घर की हालत खराब थी| रमेश को अपनी पढ़ाई पूरी करनी थी, इसलिये वह अपने चाचा के गांव चले गए|वहीं उन्होंने 12 वीं कक्षा की परीक्षा दी| इसके बाद उनके पिता का देहांत हो गया| रमेश ने 12 वीं में 88.5% मार्क्स से परीक्षा उत्तीर्ण की|

रमेश घोलप ने 2010 यूपीएससी की परीक्षा दी

12 वीं के बाद रमेश घोलप ने डिप्लोमा इन एजुकेशन किया| फिर महाराष्ट्र में ओपेन यूनिवर्सिटी से ग्रेजुएशन किया. सरकारी टीचर की परीक्षा पास की और टीचर बन गए. उनकी मां बहुत खुश थी. लेकिन रमेश का टारगेट कुछ और था|पांच से छह महीने ही टीचर की नौकरी की| उनकी मां ने गाय के नाम पर कर्ज लिया. जे पैसे मिले, उसी पैसे से 2009 में वे पुणे चले गए. 2010 ने यूपीएससी की परीक्षा दी, जिसमें वे असफल रहे|रमेश घोलप

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महाराष्ट्र पब्लिक सर्विस कमीश्न की परीक्षा में टॉप भी किया

फिर 2011 में यूपीएससी की परीक्षा दी, जिसमें वे सफल रहे. यही नहीं उन्होंने महाराष्ट्र पब्लिक सर्विस कमीश्न की परीक्षा में टॉप भी किया. लेकिन उनका यूपीएससी में चयन होने के कारण उसे छोड़ दिया|रमेश घोलप ने तय किया था.की तब गांव नहीं आऊंगा,जब तक आईएएस ना बन जाऊं| इस सपने को सच करने के लिए उन्होंने जी-तोड़ मेहनत की और यह सपना 12 मई 2012 को पूरा हुआ|

आईएएस बन गए और 18 महीने के बाद वे अपने गांव पहुंचे. वजह यह थी कि रमेश आईएएस ऑफिसर बनने से पहले कसम खाई थी कि जब तक वो आईएएस की परीक्षा को पास नहीं कर लेते वो गांव नहीं आएंगे|अपनी मां के साथ चुडियां बेचकर अपना पेट पालने वाले रमेश आज आईएएस अधिकारी बनकर आज के युवाओं के लिए एक मिसाल बन चुके हैं|

Image Source:- medium.com

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