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Film Reviews-रिव्यु- मैडम चीफ मिनिस्टर – “राजनीतिक किरदार से प्रेरित फिल्म”
सिनेमाघरों में नई फिल्मों की रिलीज धीरे-धीरे पटरी पर लौट रही है। ‘शकीला’ के बाद थियेटर में रिलीज होने वाली ‘मैडम चीफ मिनिस्टर’ रिचा चड्ढा की दूसरी फिल्म है। नाम से ही इंगित होता है कि यह महिला के मुख्यमंत्री बनने की कहानी है। यह किसी की बायोपिक नहीं, काल्पनिक है, लेकिन उसे देखते हुए कुछ पुराने राजनीतिक घटनाक्रमों की यादें अवश्य ताजा हो सकती हैं।

पत्रकारिता के क्षेत्र से आये हुए दो लोग जब एक फिल्म में हो तो उस फिल्म के राइटिंग पार्ट से उम्मीदें बढ़ जाती है, मगर सिनेमा की अपनी सीमाएं होती है जिनके बहार निकल कर बात करना कई बार मुश्किल हो जाता है, ऐसा ही कुछ मैडम चीफ मिनिस्टर के साथ भी हुआ है, कुछ विवादों के चलते फिल्म का पोस्टर रिलीज़ होते ही चर्चा में आ गया था, निर्देशक सुभाष कपूर और ऋचा चड्ढा दोनों ही पत्रकारिता के क्षेत्र से सिनेमा में आये है, ऋचा अपनी पहचान गैंग्स ऑफ़ वास्सेय्पुर से बना चुकी है, वही सुभाष जॉली एलएलबी से शोहरत हासिल कर पाए |

यह कहानी निम्न जाति में जन्मी तारा रूपराम (रिचा चड्ढा) की है। उसके जन्म के दिन ही जातिवाद की लड़ाई में पिता मार दिए जाते हैं। कहानी आगे बढ़ती है। बिंदास और तेजतर्रार तारा ऊंची जाति के छात्रनेता इंद्रमणि त्रिपाठी (अक्षय ओबेराय) से प्यार में धोखा खाती है। घटनाक्रम ऐसे मोड़ लेते हैं कि तारा दलितों के हितार्थ काम करने वाले मास्टर जी यानी सूरज भान (सौरभ शुक्ला) के संपर्क में आती है। वह उनकी पार्टी से चुनाव जीतने के बाद मुख्यमंत्री भी बन जाती है। ताग ऐसे काम करती है, जो उसके समाज और समुदाय में उसे लोकप्रिय बनाने है। इसमें दलगत और जातिवाद राजनैतिक अड़चने भी आती हैं|तारा उन्हें अपनी सूझबूझ से सुलझा लेती हैं | हालांकि वह गठबंधन पार्टी से इंद्रमणि को मंत्री बनाने से इन्कार कर देती है। उससे प्रतिशोध लेना चाहती है। दोनों की आपसी रंजिश और सत्ता को लेकर तारा के अपने लोग ही उसके साथ कैसे धोखा करते हैं, फिल्म यह कहानी बयां करती है।

Film Reviews: सुभाष कपूर ने पहली बार विशुद्ध राजनीतिक फिल्म बनाई है। उन्होंने इसे इतना काल्पनिक भी नहीं रखा है। कि सब कुछ कृत्रिम और हवाहवाई दिखने लगे तारा, इंद्रमणि, मास्टर जी, गठबंधन पार्टी के नेता अरविंद सिंह (शुभ्राज्योति बरत) जैसे चरित्रों को हम विभिन्न राजनीतिक पार्टियों में आए दिन देखते रहते हैं। फिल्म पिछड़े लोगों की ताकत बनकर उभरे राजनेता और उनकी वजह से प्रभावित हो रही राजनीति की बात करती हैं। यहां वोटबैंक के पीछे के गणित को दर्शाने का भी प्रयास है। चुनावी मौसम में बोटरों को लुभाने को लेकर राजनेताओं के तौर-तरीकों पर भी सवाल है। कह सकते हैं कि याह वोटबैंक को छीनाझपटी की भी झलक देता है। चुटीले, धारदार और प्रासंगिक संवाद उसे ठोस आधार देते हैं। हालांकि छल प्रपंच और राजनैतिक देव पेंच में नयापन नहीं हैं |

चरित्रों के गठन में भी अधूरापन है। इंद्रमणि, दानिश खान (मानव कौल), तारा के भाई बबलू के किरदार को विस्तार नहीं मिला है। जातिवाद के मुद्दे की गहराई में भी सुभाष नहीं जा पाए हैं। राजनीतिक रस्साकशी को दिखाते हुए फिल्म निजी प्रतिशोध पर आ जाती है। मास्टरजी के किरदार के अंत का प्रसंग भी जल्दबाजी में गढ़ा लगता है।

मैडम चीफ मिनिस्टर बनीं रिचा चड्ढा की तीक्ष्णता उभर कर आई है। वह दबंग और आक्रामक चरित्र के रूप में स्वाभाविक लगती हैं। उनके भाषण का अंदाज रोचक हैं। अक्षय ओबेराय के किरदार को पूरी तरह उभरने का मौका नहीं मिला। सौरभ शुक्ला अपनी भूमिका में प्रभावशाली लगे हैं। मानव कौल ग्रे शेड किरदार में हैं। फिल्म का थीम गीत चिड़ी चिड़ो… स्वानंद किरकिरे ने गाया है, जो तारा के किरदार की समुचित व्याख्या करता है। सिनेमेटोग्राफर जयेश नायर ने लखनऊ और गांव की खबसूरती को बखूबी कैमरे में कैद किया है। लेखन के स्तर पर सशक्त होती तो रिचा के करियर बेहतरीन फिल्म होती|
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