July 6, 2020

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मंज़िल की चाहत को मज़दूरों ने बेबसी को ताक़त बना लिया

मंज़िल की चाहत को मज़दूरों ने बेबसी को ताक़त बना लिया

मज़दूरों: मजदूर बेबस, बेसुध सरकार

हज़ारों कहानियां,लाखों तस्वीरें, करोडों लोग, मज़दूरों,अनगिनत उम्मीदें लेकिन लचर सिस्टम लाचार मजदूर, बेबस मजदूर बेसुध सरकार, चुप रहे हुक्मरान चिल्लाते रहे मजदूर किसी ने नहीं सुनी भूख से तड़पती उस आवाज़ को और फिर निकल पड़े अपने-अपने आशियाने के लिए बस अब पैदल ही जाना है। फैक्ट्री तो बंद हो गई मालिक पैसा दे नहीं रहे,मकान मालिक किराया छोड़ नहीं रहे, राशन फ्री में मिल नहीं रहा तो अब क्या करें बस चल पड़े अब पैदल ही जाना है।

फटे कपड़े हैं,चप्पलें टूटी हैं, सड़क धूप

बाइबल में किस्सा है कि मिस्र में गुलामों की तरह रहे लोगों को जब दासता से मुक्त कराया गया, तो वे लोग मिस्र से इजरायल भारी संख्या में भागे थे।आज देश में मज़दूरों भी वैसे ही इस शहर की जंजीरों को तोड़ते हुए खुद को आज़ाद कराना चाहते हैं ये लोग दास नहीं हैं, लेकिन जिस शहर की दीवारों को अपने खून से सींचा हो आज उसी शहर में 2 निवाले के लिए तरस रहे हैं।
मज़दूरों – फटे कपड़े हैं,चप्पलें टूटी हैं, सड़क धूप से तपती जा रही है,पुलिस की लाठियां खाये जा रहे हैं लेकिन मंज़िल दिख रही है बस घर जाना है अब पैदल ही जाना है सवालों की फेहरिस्त है,मगर जवाब कहीं नहीं है. किसी के पास है भी कि नहीं, पता नहीं और वो पूछ भी नहीं रहे, शायद उन्हें याद नहीं है कि कोई सरकार भी है कोई सरकारिया सिस्टम भी है जो खुद के जिंदा होने का सबूत नहीं दे रहा है, क्योंकि उन्हें पता मजदूर एक तमाशा है और सब के सब तमाशाई हैं कइयों ने कहा भी साहेब हम तो मजदूर हैं इसीलिए तो मजबूर हैं।

भूखे-बेबस मजदूरों को खरी खोटी सुना रही है

वो इस बनावटी दिखावटी शहर से कोसों दूर जाना चाहते हैं इन शहरों ने उनके सपनों को कुचला है, अरमानों का गला घोंट दिया,मज़दूरों भरोसे के साथ फ़रेब हुआ है|इसी बनावटी शहर के रिहायसी इलाक़ों में रइशों की जमात वातानुकूलित कमरे में बैठ पकवानों का लुत्फ़ उठा रही है. बालकनी में थाली बजा रही है| घर की देहरी पर दीये जला रही है और भूखे-बेबस मजदूरों को खरी खोटी सुना रही है कि अब ये मजदूर पूरे देश में फैला देंगे मजदूरों को तो ये भी पता नहीं कि ये जो समय उनके सामने काल बनके बैठा है वो तो हवाई जहाज से आया था और सड़कों पर पैदल वो चल रहे हैं। अपनी मजबूरी के पहिये के नीचे वो दबते जा रहे हैं और जान गवांते जा रहे हैं।
मज़दूरों
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नेहरू का जवाब

1947 के विस्थापन में भी अनगिनत मौतें हुईं, पलायन हुआ लोग बेघर हुए और लेकिन उस समय सवाल पूछा गया नेहरू का गिरेबान पकड़कर पूछा गया। लोहिया के कहने पर एक महिला संसद परिसर में आ गईं और नेहरू जैसे ही गाड़ी से उतरे, महिला ने नेहरू का गिरेबान पकड़ लिया और कहा कि “भारत आज़ाद हो गया, तुम देश के प्रधानमंत्री बन गए, मुझ बुढ़िया को क्या मिला.” इस पर नेहरू का जवाब था, “आपको ये मिला है कि आप देश के प्रधानमंत्री का गिरेबान पकड़ कर खड़ी हैं.”आज किसी में हिम्मत है जो सिस्टम के गिरेबान में हाथ डालकर पूछ ले कि क्यों किया ऐसा क्यों मरने के लिए छोड़ दिया क्यों हमारे दर्द को देखा नहीं उसमें मरहम क्यों नहीं लगाया।
इस दर्द का अंत नहीं है, अनंत कथाएं हैं- बच्चे, जवान, बूढ़े, महिला, पुरुष- सब बता रहे हैं कि उन्होंने क्या-क्या भोगा, उनका भरोसा किस तरह दरक गया और किस तरह अपना जीवन नए तरीके से जीने का सोच रहे हैं। जिसको भी कराहती कहानियां देखनी हो देश के किसी राष्ट्रीय राजमार्ग पर चले जाएं मिल जाएंगी अनगिनत कहानियां।
कोरोना संकट के दौरान हमनें अपनी आत्मा और नैतिकता के घेरे को खो दिया है। अधिकांश उद्दोगपतियों ने लॉकडाउन के पहले-दूसरे चरण में मजदूरों को पैसा देना उचित नहीं समझा, तीसरा चरण समाप्त होने तक सरकार ने खुद कह दिया पैसा देना ज़रूरी नहीं है।

16 प्रतिशत मजदूर ही नियमित रोजगार से जुड़े हुए

गांवों में रोजगार की कमी, खेती में फायदा नहीं, खेती करने के आधुनिक साधन नहीं, फसल का उचित मूल्य नहीं मिलने पर बढ़ते शहरीकरण के आकर्षण में पलायन होता गया। शहरों में भी काम मिला लेकिन शोषण भी हुआ हालांकि सरकार ने असंगठित क्षेत्र के कामगारों को सामाजिक सुरक्षा देने के लिए कदम उठाये पर अभी इसे नाकाफी ही माना जाएगा। हाल फिलहाल कुछ राज्यों ने लेबर लॉ में संशोधन करके फिर से उनके अधिकारों को कुचल दिया। एक मोटा माटी अनुमान के अनुसार देश में केवल 10% श्रमिक ही संगठित क्षेत्र में हैं। 90 फीसदी कामगार असंगठित क्षेत्र में हैं। जानकारों के अनुसार असंगठित क्षेत्र के कामगारों में भी 60 प्रतिशत कामगारों की स्थिति बेहद चिंताजनक मानी जाती है। 50 फीसदी श्रमिक केजुअल वेज पर काम कर रहे हैं वहीं केवल 16 प्रतिशत मजदूर ही नियमित रोजगार से जुड़े हुए हैं।

2020 कैसा होगा ये सवाल आप खुद से पूछिए

बड़ा सवाल बन गया ये गए तो फिर क्या आएंगे? देश के पूर्व राष्ट्रपति ए पी जे अब्दुल कलाम ने क्या सोचा था कि 2020 कैसा होगा ये सवाल आप खुद से पूछिए। फिलहाल तो हमनें अमीर और गरीब के बीच की खाई को और गहरा कर दिया है। हमनें एक नई श्रेणी बना दी जो सीमित संसाधनों में जीने खाने को मजबूर होगी।
मजदूर अपने छालों के दर्द को भूलने वाले नहीं हैं। वे अपनी सरकार, अपने मालिकों और सोसायटी वालों को माफ करने वाले भी नहीं हैं। जिन लोगों को भी इनका साथ देना चाहिए और जिन्होंने ने भी नहीं दिया सब याद रखेगा ये मज़दूर। ये मज़दूर भी हैं मजबूर भी हैं। लेकिन सिर्फ वोटर मानने वालों याद रखना ये सिर्फ वोटर नहीं इंसान भी हैं। अब ये किसके प्रति सावधान रहेंगे ये तो मजदूर बता देंगे।इनकी ये मज़बूरी संपन्नता के मुंह पर तमाचा है |

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