July 6, 2020

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सूर्य ग्रहण – विज्ञान, वेद और ज्योतिष की दृष्टि से

सूर्य ग्रहण - विज्ञान, वेद और ज्योतिष की दृष्टि से

          क्या कहते हैं सूर्यग्रहण के बारे में

जैसे जैसे सूर्यग्रहण का समय नजदीक आता जाता है सभी लोग जाने अनजाने भयग्रस्त होने लगते हैं| एक दूसरे से पूछना शुरू कर देते हैं कि कब से कब तक रहेगा यह ग्रहण ?? क्या करें इस अवधि में ?? आदि आदि | आज हम सूर्यग्रहण को विस्तार से समझेंगे| इसको समझने के लिए हमलोग विज्ञान के साथ साथ वेद, रामचरितमानस, गीता , इतिहास और ज्योतिषशास्त्र के पास चलेंगे और उनसे जानेंगे कि वे क्या कहते हैं सूर्यग्रहण के बारे में|

पृथ्वी के एक हिस्से पर चन्द्रमा की छाया

सूर्यग्रहण पूर्णतः खगोलीय घटना है जो हर वर्ष घटित होता है| पृथ्वी और सूर्य के बीच जब चन्द्रमा आ जाता है और इसकी वजह से पृथ्वी के एक हिस्से पर चन्द्रमा की छाया पड़ती है| इस दौरान ये तीनों एक सीध में आ जाते हैं | पूर्ण सूर्यग्रहण में  सूर्य, चन्द्रमा के पीछे पूरी तरह से छुप जाता है|इस दिन गर्भवती महिलाओं को विशेष एहतियात बरतने की सलाह दी जाती है| ऐसी सलाह क्यों दी जाती है इसे भी हमलोग जानेंगे|

सूर्यग्रहण

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शुरुआत करते हैं ऋग्वेद से|

1-  ऋग्वेद में ऋषि अत्रि ने स्वरभानु ( चन्द्रमा ) नामक असुर द्वारा सूर्य को अपनी गिरफ्त में लेने की बात कही है| इसकी वजह से पृथ्वी पर गहन अंधकार छा जाता है| इस अंधकार में और रात्रि के समय व्याप्त होने वाले अंधकार में बहुत अंतर होता है| इस समय के अंधकार की वजह से पशु पक्षी भयभीत होकर अस्वाभाविक व्यवहार करने लगते हैं|

2 -इसके बाद वे कहते हैं कि स्वरभानु का सूर्य को अपनी गिरफ्त में लेने की वजह से वायु ने अपनी दिशा बदल ली| वायु के दिशा परिवर्तन की बात करते हैं| गति परिवर्तन की बात नहीं करते हैं|

3 समुद्र जल के pH मान में परिवर्तन होने लगता है| pH मान में परिवर्तन अर्थात जल के अम्लीयता और क्षारीयता में परिवर्तन की बात करते हैं| हज़ारों वर्ष पूर्व जब संसाधन इतने सीमित थे, तब Ph की बात करना, तप ही है|

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प्रणाम ऐसे ऋषि को और उनके तप को| 

समुद्र जल में आये इस परिवर्तन की वजह से समुद्र में रहने वाले जीवों और जंतुओं पर इसका प्रभाव पड़ता है|

4 – ग्रहों के आपसी तालमेल में गड़बड़ी की वजह से पेड़ पौधों में आनेवाले फूलों और फलों की संरचना पर असर होता है|     रामचरितमानस और वाल्मीकि रामायण में अरण्य कांड में ग्रहण की चर्चा की गयी है |

उसी प्रकार से भगवत

गीता में भी एक ही पक्ष में दो ग्रहण और उनके असर की बात कही गई है| राष्ट्र और राजा पर इसके प्रभाव की चर्चा की गयी है|इतिहास में चलें तो सूर्यग्रहण के साथ साथ ही युद्ध चलता है| तमाम ऐसे बड़े युद्ध मिलते हैं जिनकी शुरुआत ग्रहण के आस पास हुई है| यहाँ इतिहास में वर्णित एक ग्रहण की चर्चा  बनती है| वह ग्रहण है –

5 मई 840 का पूर्ण सूर्यग्रहण| इस ग्रहण से यूरोप का राजा इतना परेशान हो जाता है कि कुछ ही समय पश्चात् उसकी मृत्यु हो जाती है| उसकी मृत्यु के बाद उसके पुत्र गद्दी के लिए आपस में युद्ध करते हैं जिसकी परिणति वर्ष 843 में होती है| यूरोप तीन भागों में बंट जाता है जिसे आजकल हम सब फ्रांस, ज़र्मनी और इटली के नाम से जानते हैं|

ग्रहण का राष्ट्राध्यक्ष और राष्ट्र पर प्रभाव

यह है ग्रहण का राष्ट्राध्यक्ष और राष्ट्र पर प्रभाव| कब निर्मित होंगे ऐसे हालत और कब मिलेगी इससे मुक्ति यह सब सम्बंधित स्थान, समय, पात्र की दशा, योग, आदि बातों पर निर्भर होता है| इसके लिए हमें ज्योतिषशास्त्र की मदद लेनी होती है|ज्योतिषशास्त्र के तहत मेदिनी ज्योतिष अध्याय में इसकी चर्चा की गयी है| ज्योतिषशास्त्र में इसके मेदिनी पक्ष को देखे जाने की सलाह दी गयी है|

किस भाव में किस राशि में ग्रहण लग रहा है इसको देखने के साथ साथ राशिधिपति की क्या स्थिति है, नाक्षरधिपति की क्या स्थिति है, यह भी देखना है|  मूलभूत सिद्धांत को नहीं छोड़ना  है |

उदहारण के लिए –

21 जून

 

Image Source:- www.facebook.com

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