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सुभाष चंद्र बोस की 123 वीं जंयती पर कुछ उनसे जुड़ी अनदेखी कहानियां

सुभाष चंद्र बोस की 123 वीं जंयती पर कुछ उनसे जुड़ी अनदेखी कहानियां

सुभाष चंद्र बोस की 123 वीं जंयती पर कुछ उनसे जुड़ी अनदेखी कहानियां

तुम मुझे खून दो, मैं तुम्‍हें आजादी दूंगा….! जय हिन्द। जैसे नारों से आजादी की लड़ाई को नई ऊर्जा देने वाले नेताजी सुभाष चंद्र बोस की आज ( 23 जनवरी ) जयंती है| नेताजी सुभाष चंद्र बोस भारत के उन महान स्वतंत्रता सेनानियों में शुमार होते हैं|जिनसे आज के दौर का युवा वर्ग प्रेरणा लेता है। उनका ‘जय हिन्द’ का नारा भारत का राष्ट्रीय नारा बन गया। उन्होंने सिंगापुर के टाउन हाल के सामने सुप्रीम कमांडर के रूप में सेना को संबोधित करते हुए ‘दिल्ली चलो’ का नारा दिया। गांधीजी को राष्ट्रपिता कहकर सुभाष चंद्र बोस ने ही संबोधित किया था। जलियांवाला बाग कांड ने उन्हें इस कदर विचलित कर दिया कि वह आजादी की लड़ाई में कूद पड़े। अंग्रेजों के खिलाफ आजाद हिंद फौज की स्थापना करने वाले नेताजी सुभाष चंद्र बोस की जंयती को आज पूरा देश धूमधाम से मना रहा है|

बोस का जन्म 23 जनवरी 1897 को कटक में हुआ था

नेतातजी सुभाष चंद3 बोस अपने परिवार में 9 वें नंबर के बच्चे थे|नेताजी बचपन के दिनों मे से ही एक विलक्षण और राष्ट्रप्रेमी छात्र थे| नेताजी ने कॉलेज के दिनों में एक अंग्रेजी शिक्षक के भारतीयों को लेकर आपत्तिजनक बयान पर उन्होनें खासा विरोध किया| जिसकी वजह से उन्हें कॉलेज से निकाल दिया गया था| नेताजी ने आजाद हिंद की जंग में शामिल होने के लिए भारतीय सिविल सेवा की आरामदेह नौकरी ठुकरा दी थी|भारतीय सिविल सेवा परीक्षा में उनकी चौथी रैंक थी|

नेताजी को जलियांवाला बाग हत्याकांज ने इस कदर विचलित किया कि वे भारत की आजादी की लड़ाई में कूद पड़े , साल 1921 से लेकर साल 1941 के बीच नेताजी को भारत के अलग-अलग जेलों में 11 बार कैद किया गया था|साल 1941 में उन्हें घर में नजरबंद करके रखा गया था| जहां से भागकर पेशावर के लिए चले गए थे| यहां से ट्रेन पकड़ कर वह काबूल पहुंचे औऱ फिर काबूल के बाद वह जर्मनी के लिए रवाना हो गए| जहां पर उनकी मुलाकात अडॉल्फ हिटलर से हुई| जहां पर रहते हुए उन्होनें 1943 में बर्लिन में आजाद हिंद रेडियो और फ्री इंडिया सेंटर की स्थापना की थी|

नेताजी सुभाष चंद्र बोस महात्मा गांधी की कई बातों और विचारों से इत्तेफाक नहीं रखते थे|और इस पर उनका मानना था कि हिंसक प्रयास के बिना भारत को आजादी नहीं मिलेगी नेताजी का ऐसा मानना था कि अंग्रेजों को भारत से खदेड़ने के लिए सशक्त क्रांति की आवश्यकता है| तो वहीं गांधी अहिंसक आंदोलन में विश्वास करते हैं|

ब्रिटिश सैनिकों को बंदी बनाकर इसी गांव में लाई थी

बताया जाता है कि नागालैंड की पहाड़ी पर रूजाहो नामक एक गांव है| जो डिमापुर से 80 किमी और कोहिमा से 45 किमी की दूरी पर है| वहां से तत्कालीन बर्मा अब म्यांमार की दूरी करीब 200 किलोमीटर है| सन 1944 में बोस और उनकी आजाद हिंद फौज पहली बार इस गांव में गई| इस गांव में पहली बार आजाद हिंद सरकार का प्रशानिक टीम का गठन किया गया था| टीम में पहली बार गांव बूढ़ा ग्राम प्रधान की तरह का एक पद सृजित किया गया था| उस वक्त पंचायत का प्रशासनिक ढ़ांचा क्या था| इस पर अभी भी रिसर्च चल रहा है| साल 2017 में इंडियन काउंसिल ऑफ हिस्टोरिकल रिसर्च ने एक नेशनल सेमिनार का आयोजन भी किया था| जिसमें नागालैंड औऱ त्रिपुरा के गवर्नर भी मुख्य अतिथि के तौर पर शामिल हुए थे|

बताया ये भी जाता है कि रूजाहो गांव करीब 1 किमी दूर जेसामी में ब्रिटिश सेना औऱ आजाद हिंद फौज के बीच युद्ध हुआ था| हिंद फौज ने सैकड़ो ब्रिटिश सैनिको को हराकर बंदी बनाकर उन्हें इसी गांव में ले आई थी| इस गांव में नेताजी सुभाष चंद्र बोस अपनी आजाद हिंद फौज के साथ 9 दिनों तक रूके थे| वह कमरा आज भी मौजूद है| कमरे में लकड़ी का एक तख्त भी पड़ा है जिस पर बोस एक त्रिपाल बिछाकर सोते थे| वहां मौजूद चुल्हे पर खुद ही खाना बनाते थे|

आज भी जीवित नेताजी द्वारा नियुक्त ग्राम प्रधान

नेताजी ने इस गांव मेंम पहली बार इस गांव मे एक प्रधान को नियुक्त किया था , उस प्रधान का नाम बपोसूयुवी स्वोरो है जो आज भी इस गांव में जीवित है , बपोसूयुवी की उम्र 100 साल से अधिक है , वे आजाद हिंद फौज और ग्रामीणों के लिए ट्रांसलेटर का भी काम किया करते थे , नौ दिन के प्रवास के बाद नेताजी सुभाष चंद्र बोस फौज की रणनीति बनाकर गांव से चले गए थे, इसी दौरान ब्रिटिश सरकार के बॉमबर ने पहाड़ी से कुछ दूरी पर बम भी गिराया था

पहाड़ी से नीचे उतरकर महिलाओं ने पहुंचाया था पानी

नेताजी के जाने के बाद भी पूरे गांव में फौज थी| जून-जुलाई के महीने में भयंकर बारिश हुई| जिसके कारण आजाद हिंद फौज को काफी दिक्कतों का सामना भी करना पड़ा था| रूजाहों गांव में फौज के लिए रसद पहुंचना बंद हो गया था| लोग भूखे रहने लगे , ग्रामीण महिलाएं किसी तरह पहाड़ी से नीचे जाकर फौज के लिए पानी लाती थी| लेकन जब हथियार और गौला बारूद फौज को पहुंचना बंद हो गया तो इसकी वजह से फौज को वहा से दूसरी जगह सिफ्ट होना पड़ा था|

Image Source : jansatta

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