March 30, 2020

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भारत में जल की स्थिति एवं समस्याएँ

भारत में जल की स्थिति एवं समस्याएँ

प्रकृति के तत्वों, जल, अग्नि, वायु, पृथ्वी एवं आकाश में से जल ही एक मात्र तत्व है, जो सीमित है। कई वर्षों से यह दिख रहा है कि जितने व्यक्ति पानी से प्रभावित होते हैं, लगभग उतने ही व्यक्ति ज़्यादा पानी होने से भी प्रभावित होते हैं। जल न्यूनता या सूखा एवं जल आधिक्य या बाढ़ दोनों ही समस्याएँ जल संकट के दो पहलू हैं ,जल संकट में दिन प्रतिदिन गिरावट आती जा रही।

भूमिगत जल का संतृप्त तल गहराई की ओर खिसक ने से परंपरागत जलस्रोत सूख रहे हैं। पृथ्वी पर कुल उपलब्ध जल लगभग 01अरब 36 करोड़, 60 लाख घन कि.मी. है, परंतु उसमें से 97.5 प्रतिशत जल समुद्री है जो खारा है, यह खारा जल समुद्री जी, जल संकट वनस्पतियों के अतिरक्त तथा मानव जीवों के लिये अनुपयोगी है। सिर्फ 2.5 प्रतिशत जल मीठा है। तथा लगभग 5.00 लाख घन किलोमीटर जल गंदा व प्रदूषित हो चुका है।

जल गुणवत्ता:

प्राचीन काल से ही जल के लिये अधिक समृद्धि क्षेत्र उपमहाद्वीप को माना जाता था, पर वर्तमान समय में विश्व के अन्य देशों की तरह भारत में भी जल संकट की समस्या काफी बढ़ गई है। जल संकट आज भारत के लिये सबसे महत्त्वपूर्ण प्रश्न है, जिस भारत में 70 प्रतिशत हिस्सा पानी से घिरा हो वहाँ आज स्वच्छ जल उपलब्ध न हो पाना बहुत बड़ी समस्या है।

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भारत में तीव्र नगरीकरण से तालाब और झीलों जैसे जलस्रोत सूख गए हैं। उत्तर प्रदेश में 36 ऐसे जिले हैं जहाँ हर साल 20 सेंटीमीटर से अधिक की गिरावट आ रही है। उत्तर प्रदेश के इन विभिन्न जनपदों में प्रतिवर्ष पोखरों का सूख जाना, भूजल स्तर का नीचे भाग जाना, बंगलुरु में 262 जलाशयों में से 101 का सूख जाना, दक्षिण दिल्ली में भूमिगत जलस्तर 200 मीटर से नीचे चला जाना, चेन्नई और आस-पास के क्षेत्रों में प्रतिवर्ष 3 से 5 मीटर भूमिगत जलस्तर में कमी, जल संकट की गंभीर स्थिति की ओर ही संकेत करते हैं|

वर्तमान में जल संकट बहुत गहरा है। आज पानी का मूल्य बदल गया है और जल महत्त्वपूर्ण व मूल्यवान वस्तु बन चुका है। शुद्ध जल जहाँ एक ओर अमृत है, वहीं पर दूषित जल विष और महामारी का आधार है

जल के स्रोत:

जल संसाधन और संरक्षण आज की आवश्यकता है, जिसमें जनता का सहयोग बहुत ज़रूरी है। जल की कमी से मानव जीवन के रहन-सहन में अंतर आ रहा है। 21वी सदी में जहाँ भारत ने विकास किया है,वही जनसंख्या वृद्धि के साथ नगरीकरण व औद्योगीकरण ने जल की मांग को बढ़ाया है। यह मानव समाज के लिये चिंता का विषय है। समस्या मानव जीवन का एक अंग है। मानव का जीवन समस्याओं का निदान करते हुए बीतता है, किंतु जब एक ही समस्या हर बार वैसी ही आती है, तो वह समस्या मानवीय रूप से उत्पन्न समस्या होती है। जल संकट भी मानवीय रूप से उत्पन्न एक समस्या है। मानव ने सभ्यता प्रगति के साथ प्रकृति का भी दोहन किया है|

उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, गुजरात, राजस्थान, हरियाणा, पंजाब, तमिलनाडु और केरल जैसे राज्यों में जहाँ पानी की कमी बढ़ी है, वहीं राज्यों के मध्य पानी से जुड़े विवाद भी गहराए हैं| जब गर्मी काफी गंभीर होती है तो कभी-कभी पानी पूरा सुख जाता है। इंसान और जानवर दोनों पानी के लिए तड़पते हैं। अगर बारिश होती है तो इतनी बारिश होती है की बाढ़ आती है। थैच से बने घर पानी में डूब जाते हैं।

जब फसलों की अपर्याप्त उपज होती है तो अकाल पड़ता है। चावल, गेहूं, राग और गन्ना दुर्लभ हैं। वास्तव में हर प्रकार के अनाज में कमी है।भारत में दो चरम सीमाएं हैं। राष्ट्र में पानी ख़त्म हो जाता है या भारी वर्षा होती है, जिससे बाढ़ आती है। जबकि उत्तर भारत कभी बाढ़ से ग्रस्त है, कभी-कभी दक्षिण अपर्याप्त जल आपूर्ति से ग्रस्त है। खेती किए गए खेतों में पर्याप्त पानी नहीं है और फसलों की उपज अपर्याप्त है। पर्याप्त पेयजल के बिना लोग पीड़ित हैं।

लातूर जल संकट

हाल फिलहाल में महाराष्ट्र के लातूर शहर में लोगों को भीषण जल संकट का सामना करना पड़ रहा है। अधिकारी इस बात को स्वीकार कर रहे हैं कि घरों के नलों में 15 दिन में एक बार जल आपूर्ति की जा रही है। अधिकारियों का कहना है कि बिजली के बिलों का भुगतान नहीं हुआ है जिसके कारण नगर निकाय की बिजली आपूर्ति ठप हो गई है और इस कारण से हालात और खराब हो गए हैं।

महाराष्ट्र का यह 16वां सबसे बड़ा शहर आमतौर पर जल संकट के लिए खबरों में रहता है ,और यहां के पांच लाख नागरिकों को राहत पहुंचाने के लिए ट्रेन के जरिए पानी भेजना पड़ता है। लातूर नगर निगम के एक वरिष्ठ अधिकारी ने कहा कि लातूर में बीते छह दिन से नगर निगम की ओर से जलापूर्ति नहीं की गई है। लातूर नगर निगम के कार्यकारी अभियंता विजय चोल्खाने ने बताया, ‘‘बिजली का बकाया 4.19 करोड़ रुपये पर पहुंच गया है। हम लातूर के पांच लाख लोगों को छह दिन में एक बार पानी की आपूर्ति कर रहे थे लेकिन अब 15 दिन में एक बार कर रहे हैं।

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ऐसे में भविष्य में पानी की समस्या और बढ़ जाएगी और हम कोई समाधान नहीं निकल पाएंगे, क्युकि जल ही जीवन है और अगर यह ही हमारी ज़िन्दगी में नहीं रहेगा तो मनुष्य कैसे ज़िंदा रहेगा| सन 2030 तक देश की 40 प्रतिशत से अधिक जनसंख्या को पेयजल उपलब्ध नहीं हो सकेगा। अगले पाँच वर्ष में यदि इस समस्या का सरकारों, गैर-सरकारी संगठनों, एवं स्वयं जनता द्वारा कोई उपाय नहीं किया गया तो भारत को जल संकट की भंयकर स्थिति से झुंझना होगा। अभी हाल में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने अपने मन की बात कार्यक्रम में स्वच्छता आंदोलन की तरह ही जन-मन की सक्रिय सहभागिता के साथ जल संरक्षण आंदोलन चलाने का आह्वान किया है|

जल चक्र :

इस संकट से उबरना अकेले सरकार के वश में नहीं है। प्राप्त पेयजल का घरों में विभिन्न उपयोगों में सावधानीपूर्वक उपभोग करना, वर्षा जल का संचयन करना तथा उपयोग किए गए जल को पुनः उपयोग योग्य बनाने (WATER RECYCLING) का निर्णय लिया गया है| सरकार को छोटे घरेलू वाटर रिसाइकलिंग प्लांट बनवाकर बहुमंजिली इमारतों तथा महानगरों की कालोनियों में लगाना अनिवार्य करना होगा, क्योंकि पानी की सबसे ज़्यादा बर्बादी इन्ही इलाकों में होती है|

image source : hindi.mapsofindia.com

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