May 28, 2020

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Wine Shops & Lockdown – ठेके पर लोकतंत्र के दिलकश नज़ारे

Wine Shops & Lockdown - ठेके पर लोकतंत्र के दिलकश नज़ारे

Wine Shops & Lockdown – लोकतंत्र ईश्वर के समान है। मानो तो हर जगह, अन्यथा कहीं नहीं। जिस तरह ईश्वर के दर्शन आसान नहीं हैं, और ईश्वर का अस्तित्व कई बार विकट आस्था का प्रश्न हो जाता है, उसी तरह देश में कई बार लोकतंत्र भी विकट आस्था का सवाल हो जाता है। मसलन-जिस अदालत परिसर में बंदा न्याय की गुहार लगाते हुए अपना घर-जमीन बेचकर पहुंचता है, उसी परिसर में वकील उसकी जेब सरेआम काट देते हैं। उस वक्त बंदे को समझ नहीं आता कि लोकतंत्र है, था या अभी-अभी मर गया?

इसी तरह थाने में पुलिस के डंडे के सामने, निजी अस्पतालों में मुर्दे को जीवित बनाए रखने के चमत्कार में और सरकारी अस्पतालों के वार्ड में टहलते कुत्तों के बीच इलाज कराते मरीज की मनोहारी तस्वीरों में लोकतंत्र की अलग-अलग छवियां देखने को मिलती हैं। मुझे लोकतंत्र की एक अलहदा तस्वीर देखने को मिली शराब के ठेके पर।

आपने मन में सवाल आ सकता है कि मैं शराब के ठेके पर क्या कर रहा था? लोकतंत्र इसलिए खूबसूरत शय है कि यहां हर व्यक्ति के मन में कोई भी सवाल आ सकता है। लेकिन, लोकतंत्र की ही खूबसूरती है कि यहां हर सवाल का जवाब देना जरुरी नहीं। जिस तरह सूचना के अधिकार के तहत पूछे गए कई सवालों को अधिकारी राष्ट्रीय सुरक्षा का मसला बताकर डंप कर देते हैं, उसी तरह ‘मैं ठेके पर क्यों था’ का जवाब अपनी सुरक्षा से जुड़ा मसला बताकर मैं डंप कर रहा हूं। मैं वहां था, बस यह सत्य है। उसी तरह, जिस तरह लोकतंत्र में नेता जनसेवक होता है, ये सत्य है।

Wine Shops & Lockdown – कहाँ चल रहा है गड़बड़ घोटाला 

लोकतंत्र में जिस तरह हर धर्म, हर जाति, हर वर्ग का बराबर का स्थान होता है, उसी तरह ठेके पर बराबरी का भाव था। एक पल को लगा कि हिन्दू, मुस्लिम, सिख, ईसाई, आपस में भाई-भाई वाला गीत कवि ने ठेके पर एकता से भरपूर दृश्य देखकर ही लिखा होगा। संविधान में निहित बराबरी के अधिकार के भी यहां दर्शन हुए। मर्सिडीज से उतरा बंदा भी उसी लाइन में था, जिस लाइन में वो बंदा भी था, जो अपनी खटारा मारुति 800 से आया था। फटी जींस पहने रईसजादे भी उसी लाइन में थे, जिस लाइन में फटी शर्ट पहने रिक्शेवाले लगे थे।

अब्राहम लिंकन ने लोकतंत्र को लोगों का लोगों द्वारा लोगों के लिए शासन बताया था। बिलकुल यही नज़ारा ठेके पर था। लोग ही लोगों की लाइन लगवा रहे थे। कतार में लगे सभी लोगों को बोतल मिलने से पहले दुकान बंद ना हो जाए, इसके लिए लोग ही पुलिसवाले को समझा रहे थे। जिस तरह ठेके लेते वक्त ठेकेदार मंत्री का सेवक हो जाता है, उसी तरह बोतल लेने से पहले लोग पुलिसवाले के सेवक बने हुए थे। दुकानदार को बोतल देने में कोई परेशानी ना हो, इसके लिए लोग बतौर स्वयंसेवक उसकी मदद करने की पेशकश कर रहे थे।

मंदिर में पेड़ा बंटेगा तो सबको मिलेगा की तर्ज पर सबको मिलेगी का आश्वासन देते दो-चार लोग कतार से बाहर निकलकर आगे-पीछे घूम रहे थे ताकि ठेके पर निर्मित लोकतंत्र को कोई बागी ठेस ना पहुंचा दे। जिस तरह केंद्र संकटकाल में राज्यों को जितना पैकेज दे देता है, उन्हें मनमसोसकर उसी से संतोष करना पड़ता है, उसी तरह ठेके पर दुकानदार ने जितनी बोतल दे दीं, उतनी ग्राहक चुपचाप रख रहे थे। इस तरह ठेके पर संघीय ढांचे की खूबसूरती के दर्शन भी हुए। लोकतंत्र के विकास के लिए परस्पर सहभागिता और समन्वय जरुरी है, तो ठेके पर बंदे एक दूसरे को पान-बीड़ी कहां मिलेगी का निशुल्क सुझाव दे रहे थे।

Wine shops & Lockdown – ठेके पर लोकतंत्र के दर्शन कर मैं धन्य हुआ। मुझे यकीन है कि ठेके से बहता लोकतंत्र धीरे धीरे घर-समाज सब जगह पहुंचेगा। जिस तरह लोकसभा-राज्यसभा की कार्यवाही दिखाने के लिए बच्चों को संसद ले जाया जाता है, मेरा मानना है कि कोरोना काल जारी रहे तो नेताओं को लोकतंत्र के दर्शन के लिए ठेकों पर लाना चाहिए। आखिर, वो लोकतंत्र को ठेंगे पर रखने के आदी जो हैं।

Piyush Pandey

पीयूष पांडेय – लेखक कवि,पत्रकार और व्यंग्यकार हैं और अपने 2 दशकों के शानदार अनुभव से पाठकों को जागृत करने का प्रयास करते रहते हैं|

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